श्रीहनुमानजी प्रेम का सागर तथा वे सूक्ष्मता के स्वामी है।

hanuman

“….मानव अस्तित्व में श्रीहनुमानजी की महत्वपूर्ण भूमिका है। निरंतर हमारे स्वाधिष्ठान से मस्तिष्क ( पिंगला नाड़ी ) तक चलते हुए वे हमारी भविष्य की योजनाओं या मानसिक गतिविधियों के लिए आवश्यक मार्गदर्शन तथा सुरक्षा प्रदान करते है।

………..आकाश की सूक्ष्मता श्रीहनुमान के नियंत्रण में है। वे इस सूक्ष्मता के स्वामी है और इसी के माध्यम से वे सन्देश भेजते है। दूरदर्शन, आकाशवाणी तथा ध्वनिवर्धन उनकी इसी शक्ति की देन हैं। बिना किसी संयोजक के आकाश मार्ग से वायवीय (एथनिक) सम्बन्ध स्थापित करना इस महान अभियंता का ही कार्य है। यह कार्य इतना पूर्ण है कि आप इसमें कोई त्रुटि नहीं निकाल सकते। आपके यंत्रों में त्रुटि हो सकती है, श्रीहनुमानजी की कार्य कुशलता में नहीं।
……यहाँ तक कि हमारे अंदर की सूक्ष्म लहरियों का हमारी नस – नाड़ियों पर, हमारे रोम-रोम पर अनुभव होना भी श्रीहनुमानजी की कृपा से है।

………..भौतिक सतह पर विद्युत चुम्बकीय शक्ति श्रीहनुमानजी की शक्ति है परन्तु भौतिकता से वे मस्तिष्क तक जाते है, स्वाधिष्ठान से उठकर मस्तिष्क तक जाते है। मस्तिष्क के अंदर वे इसके भिन्न पक्षों के सह-संबंधों का सृजन करते है। यदि श्रीगणेश हमें विवेक प्रदान करते है तो श्रीहनुमान हमें सोचने की शक्ति देते है। बुरे विचारों से बचाने के लिए वे हमारी रक्षा करते है। श्रीगणेशजी हमे विवेक देते है तो श्रीहनुमानजी हमे सद्-सद् विवेक। सद-सद्-विवेक उनकी दी गयी सूक्ष्म शक्ति है और हमें सत्य असत्य में भेद जानने का विवेक प्रदान करती है।

….. मार्गदर्शन तथा सुरक्षा हमें श्रीहनुमानजी की देन है। आपके अहम के साथ-साथ बहुत सी अन्य बुराइयों का भी श्रीहनुमान प्रतिकार करते है। यह तथ्य लंका दहन कर रावण की खिल्ली उड़ाने में अत्यंत मधुरता से प्रकट हो जाता है।
अहंकारी लोगों से आपकी रक्षा करना श्रीहनुमानजी का कार्य है। श्रीहनुमानजी का एक अन्य गुण यह है किसी वे लोगों को स्वेच्छाचारी बना देते है। दो अहंकारी व्यक्तियों को मिलकर वे उनसे ऐसे हालत पैदा करवा देते है कि दोनों नम्र होकर मित्र बन जाते है।

…………श्री हनुमानजी हमारी उतावली, जल्दबाजी तथा आक्रमणशीलता को ठीक करते है। उनके शरीर का अंग -अंग उसी से ( शक्ति और भक्ति से ) भरा रहता है। उनकी इसी विशेषता के कारण आज हम बजरंग बलि की देश -विदेश में भी अर्चना करते है। भक्ति और शक्ति दो अलग चीजे नहीं है। एक ही है। हम ये कहेंगे की गर (राइट हैंड) में शक्ति है तो लेफ्ट हैंड में भक्ति। ये शक्ति -भक्ति का संगम, ये श्रीहनुमानजी में बहुत है। श्रीहनुमानजी प्रेम का सागर है और उसी वक्त जो दुष्ट हो, जो दूसरों को सताते है, जो दूसरों को नष्ट करते हो, उसका वध करने में उनको बिलकुल किसी तरह का संकोच नहीं होता।”
An Extract of Talk of Shri Mataji Nirmala Devi on श्रीहनुमान पूजा – १९९९

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