सबका मान करना ‘विश्व निर्मल धर्म’ सिखाता है।

samman

………….सब अवतरणो का मान करना, जितने भी आज तक बडे बडे संत, साधू, दृष्टा हो गये, सबका मान करना ‘विश्व निर्मल धर्म’ सिखाता है। ये सिर्फ कहने से नही होता, समझाने से नही हो सकता। ये आत्मा के प्रकाश में अपने आप अन्दर बेठ जाता है, उसको फिर कहनें की जरूरत नहीं होती । तब आपसोचिए कि आप सहजयोगी हो गये। माने आप बढिया लोग हो गये । देखिये आप किसी का कत्ल नहीं कर सकते। आप किसी की कोर्इ चीज छीन नहीं सकते, आप चोरी चकारी कुछ नही कर सकते। आप किसी की बुरार्इ नहीं करते, आप किसी भी को नीचे खींचने का प्रयत्न नहीं करते या आप किसी भी प्रतिस्पर्धा में नहीं पडते । आपको ये नहीं लगता कि, मैं इसकी खोपडी में जाकर बैठ जाऊं इसकी गर्दन काट लूं। …..जहां है वहा समाधान में आप बैठे है और अपने ही आप उन्नत हो रहे है।आप किसी के साथ दुष्टता नहीं करते। ……
—परमपूज्य श्रीमाताजी निर्मलादेवी, जन्मदिवस पूजा, 21 मार्च 1992—

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